अधिक मास में धरती का बैकुंठ है राजगीर

रिपोर्ट : ब्यूरो, राम विलास, नालंदा, बिहार
राजगीर;-वैसे राजगीर पहले से स्वर्ग जैसा सुंदर है। यहां का जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत हैं। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य आदि अनादि काल से केवल देश-दुनिया के सैलानियों को ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों व तपस्वियों को भी आकर्षित करते रहा है। मलमास/ अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में राजगीर धरती का बैकुंठ धाम बन जाता है। इसका कारण है कि अधिक मास आरंभ होते ही 33 कोटि देवी-देवता राजगीर पधारते और एक महीने तक कल्पवास करते हैं।

यह साहित्य, संस्कृति, परंपरा, धार्मिक और अध्यात्मिक राजधानी से कम प्रतीत नहीं होता है। पुरुषोत्तम श्रीराम, श्रीकृष्ण, ब्रह्मा सहित सभी देवी-देवताओं का पदार्पण राजगीर में हो चुका है। उनके अलावे महात्मा बुद्ध, जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की यह कर्म भूमि रही है। जैन धर्म के 20 वें तीर्थंकर मुनि सुब्रत नाथ की तो यह जन्म भूमि ही रही है।

गुरुनानक देव और मखदूम साहब ने भी राजगीर के प्राकृतिक, सांस्कृतिक और अध्यात्मिक सौंदर्य का अवलोकन किया है। ऐसे अधिक मास में संपूर्ण भारत वर्ष में किसी भी प्रकार के अनुष्ठान व शुभ कार्य शादी, विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ संस्कार आदि जैसे शुभ और मांगलिक कार्यो को मलमास/ अधिक मास में निषेध माना गया है।

इसलिए सभी मांगलिक कार्य इस अवधि में वर्जित होते हैं। किसी भी शुभ और नए कार्य को नहीं किया जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में सनातन धर्म के सभी देवी-देवता, नदियां और तीर्थ राजगीर में विराजते हैं। यही कारण है कि केवल राजगीर में ही धार्मिक और अध्यात्मिक कार्य शुभ माना जाता है। सर्व विदित है कि मलमास को ही अधिक मास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। धर्म कर्म की दृष्टि से मलमास/ अधिक मास का विशेष महत्व है।

— राजगीर तीर्थ पूजन से बढ़ती है साकारात्मकता

मलमास/अधिक मास यानि पुरुषोत्तम मास में राजगीर तीर्थ में पूजा पाठ, व्रत, उपासना, दान और साधना को सर्वोत्तम माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस काल में भगवान श्री हरि का स्मरण और शुद्ध मन से पूजा-अर्चना करना चाहिए। अधिक मास में किए गए दान आदि का पुण्य लाभ कई गुणा अधिक माना गया है। इस मास को आत्म शुद्धि से भी जोड़कर देखा जाता है। अधिक मास में व्यक्ति को मन की शुद्धि के लिए भी प्रयास करना चाहिए। मानव कल्याण के लिए आत्मचिंतन करना चाहिए। सृष्टि का आभार व्यक्त करते हुए अपने पूर्वजों को भी धन्यवाद करना चाहिए। ऐसा करने से जीवन में सकारात्मकता को बढ़ावा मिलता है।

— चंद्रमास कहलाता है अधिक मास

ज्योतिषाचार्य पंडित डॉ मिथिलेश पांडेय बताते हैं कि मलमास/ अधिक मास का संबंध ग्रहों की चाल से है। पंचांग के अनुसार मलमास या अधिक मास का आधार सूर्य और चंद्रमा की चाल से है। उनके अनुसार सूर्य वर्ष 365 दिन, करीब 6 घंटे का होता है और चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना गया है। इन दोनों वर्षों के बीच 11 दिनों का अंतर होता है। यही अंतर तीन साल में एक महीने के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्रमास आता है। यह मलमास/अधिक मास और पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है।

— श्रीहरि की पूजा से पूर्ण होती है मनोकामनाएं

अधिक मास में भगवान श्री लक्ष्मी नारायण की पूजा का विशेष महत्व बताया है। इस समय श्री हरि का चतुर्मास चल रहा है। चातुर्मास में भगवान श्रीहरि विश्राम करते हैं। विश्राम करने के लिए वे पाताल लोक में प्रवास करते हैं। माना जाता है कि इस दौरान भगवान श्री लक्ष्मी नारायण की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

Comments are closed.