गाद और गंदगी का पर्याय बनी सरस्वती नदी

 


फोटो – गाद और गंदगी से भरी सरस्वती नदी

रिपोर्ट; राम विलास,राजगीर। .
राजगीर;-पर्यटन, तीर्थाटन, अध्यात्म, आस्था और मोक्ष के लिए दुनिया में मशहूर राजगीर की सरस्वती नदी की दुर्दशा अकथनीय है. राजगीर के पहाड़ और जंगल से निकलकर यह गावों से होते हुए कहटैन और पैमार नदी में मिल जाती है। धर्म, तपस्या और अध्यात्म के नगर में इस नदी का पहले बहुत सम्मान था. सनातन धर्मावलंबी इसका बहुत ख्याल रखते थे। नदी हमेशा साफ सुथरी और सुंदर दिखती थी. इसके शीतल जल में स्नान कर लोग गर्मी और थकावट दूर करते थे। नदी के आधार तल से सालों पानी निकलता था. तब नदी में हर मौसम में पर्याप्त पानी रहता था. स्नान करने के अलावे इसके पानी से राजगीर के आसपास के दो दर्जन से अधिक गांव के खेतों की सिंचाई होती थी। मलमास मेला के दौरान प्रथम स्नान सरस्वती नदी में करने की परंपरा रही है. तीर्थयात्री सरस्वती नदी में स्नान करने के बाद ही गर्मजल के कुंडों में स्नान करते थे। साधु, संत, नागा, महंत भी शाही स्नान पहले यहीं करते थे। फिर गर्म जल के कुंडों में स्नान के लिए जाते थे. साल और शताब्दी बदलने के साथ मनुष्यों की सोच में भी परिवर्तन हुआ है। सरस्वती नदी की दुर्दशा उसी का परिणाम है। अब सरस्वती नदी में प्रथम स्नान की परंपरा समाप्त हो गई है। यह नदी अब स्नान के लायक नहीं रह गई है। यह गाद और गंदगी से भर गयी है. इसमें पानी कम और हरी हरी घास और गंदगी अधिक दिखाई पड़ती है।

21वी सदी में सरस्वती नदी की उपेक्षा और बदहाली पराकाष्ठा पर है। सनातन धर्मावलंबियों और सरकार दोनों से यह उपेक्षित है। इसकी सुध कोई नहीं ले रहे हैं. फलस्वरूप यह नदी गाद और गंदगी से बजबजा रही है। बावजूद इसकी बदहाली पर किसी को तरस नहीं आ रही है। नदी की गंदगी देखकर स्थानीय या बाहरी सभी लोग नाक पर रुमाल/ दुपट्टा रखकर गर्मजल कुंड की ओर बढ़ जाते हैं। जानकार बताते हैं कि जल संसाधन विभाग द्वारा इस नदी की गाद और गंदगी की सफाई के लिए धन आवंटित किया जाता है। लेकिन हर बार भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। न गाद निकाली जाती है और न गंदगी की सफाई होती है। नतीजा सबके सामने है. ब्रह्मकुंड के समीप सरस्वती नदी में दो पक्का बांध बनाया गया है। यही बांध गाद और गंदगी की वजह मानी जा रही है। दोनों बांधों के बीच के भाग की उड़ाही अपेक्षित है. स्थानीय लोगों की माने तो उड़ाही के बाद यह नदी पहले की तरह बन सकती है। श्रद्धालु इसमें स्नान भी कर सकेंगे और इससे किसान खेती भी कर सकेंगे. फिलहाल सरस्वती नदी अपनी बदहाली पर विलाप कर रही है। उद्धार के लिए तारणहार की बाट जोह रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वच्छता अभियान और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जल-जीवन-हरियाली योजना से यह नदी मरहूम है। इन योजनाओं के लाभ से यह कोसों दूर है. इसके गाद और गंदगी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के महत्वाकांक्षी योजना को मुंह चिढ़ा रहा है। आस्था और मोक्ष की नदी कहने वाले सनातन धर्मावलंबी भी इससे मुंह मोड़ लिए हैं। जनप्रतिनिधि, समाजसेवी और सनातन धर्मावलंबी चाहें तो जन सहयोग से भी इस नदी की उड़ाही-सफाई करा सकते हैं। अधिकारियों की तरह उनमें भी कोई रुचि नहीं है। यही कारण है कि सरस्वती नदी की कोई करुण पुकार नहीं सुन रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा प्रकृति के अनुरोध पर जल जीवन हरियाली योजना से सरस्वती नदी की उड़ाही करने के लिए डीएम को पत्र लिखा गया है। वार्ड पार्षद डॉ अनिल कुमार द्वारा भी सरकार और प्रशासन से सरस्वती नदी को पुनर्जीवित करने की मांग की गई है।

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