ग्रामीणों को शुद्ध पानी नसीब नहीं, नदी में गड्ढा खोद कर निकालते हैं पानी

अंजुम आलम की रिपोर्ट
जमुई: आजादी के 70 साल बाद भी जमुई जिले के कई इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के नसीब में स्वच्छ पेयजल नसीब नहीं हो पा रहा है। जिले के कई ऐसे प्रखंड हैं, जहां के रहने वाले आज भी सूखी नदी में गढढ़ा खोदते हैं और फिर पानी निकालकर अपनी प्यास बुझाते हैं। जमुई जिले के गिद्धौर प्रखंड और खैरा प्रखंड के बीचो बीच बहने वाली ‘बरनर’ नदी जो अकसर सूखी रहती है, पानी पीने से लेकर स्नान और शौच क्रिया तक के लिए यहां के लोग इसी नदी पर आश्रित हैं। जानकारों की माने तो जमुई जिले की भू-जल में बड़ी मात्रा में फ्लोराइड और आर्सेनिक पाया जाता है, जो इंसान के लिए काफी नुकसानदायक साबित होता है। दरअसल, गिद्धौर प्रखंड मुख्यालय से चंद दूरी पर स्थित मौरा, भलुआई, लेवा, दुल्लमपुर, अलखपुरा, बंधौरा और गरमजरुआ गांव आता है, इस गांव में रहने वाले ग्रामीणों को स्वच्छ पानी नसीब नहीं हो पा रहा है। हालांकि जमुई जिला छोटी बड़ी कई नदियों से घिरा हुआ है। जमुई जिले में साफ पानी की भारी किल्लत है। लिहाजा लोगों के स्वास्थ्य पर अब इस दुषित पानी का असर लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।

जिले में ग्रामीण पेयजल आपूर्ति का हालत और भी खराब है। खास तौर से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति का सिर्फ पाँच फीसदी सरकारी योजनाओं पर निर्भर है। जबकि 95 प्रतिशत लोग पेयजल के लिए कुंआं और नदियों पर निर्भर है लेकिन भू-जल स्तर के नीचे खिसकने से ज्यादातर कुएं भी सूख चुके है। उनकी जगह हैंड पंप और नलकूपों ने ले ली है। कुआं और चापाकल से निकलने वाले पानी की गुणवता बेहद खराब हो गई है। कई प्रखंडों में थोड़ा बहुत आर्सेनिक की मात्रा जल में पाई जा रही है। जिससे लोग गंभीर बीमारियों के घेरे में आ रहे हैं। किसी को कैंसर, किसी को सुगर तो किसी का किडनी फेल आदि कई गंभीर और लाईलाज बीमारियों से ग्रसित हो चुके हैं। आंकड़ों की माने तो ग्रामीण क्षेत्रों में 85 फीसदी पेयजल का श्रोत भू-जल है, लेकिन इसके बाबजूद भी ज्यादातर लोगों के लिए दूषित पेयजल पीना उनकी नियति बन गई है। सरकारी सर्वेक्षण के मुताबिक भू-जल में रसायनिक प्रदूषण के अलावा स्वास्थ्य के लिए घातक खनिज तत्व व आर्सेनिक की भारी मात्रा घुले हुए हैं। भू-जल में ये तत्व प्राकृतिक रूप से मिले है। रसायनिक उर्वरक और सीवरेज में नाइट्रेट मौजूद है। जिले में इन खतरनाक तत्वों को पानी से अलग करने की कारगार तकनीक का अभाव है। आँकडे के मुताबिक जिले में पंचायतों की संख्या 153 है, जिसमें गिद्धौर प्रखंड की आबादी लगभग एक लाख है, इन आबादी में आधे से अधिक लोग फ्लोराइड एवं आर्सेनिक युक्त पानी पीने को विवश है। तथा शेष बचे लोग आयरन तत्व घुले भू-जल पर गुजारा कर रहे हैं। यहां यह बताते चले कि पीएचइडी द्वारा गिद्धौर प्रखंड में कुल 500 चापाकल लगाए गए हैं, लेकिन विभागीय उदासीनता के कारण 50 फीसदी चापाकल बंद पड़े हैं, जिसके कारण आधे से अधिक आबादी को नदियों का प्रदुषित जल पीने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि आज के इस दौर में जहां सरकार की ओर से बहुचर्चित योजना ‘हर घर नल का जल’ चल रहा है, वहीं, ग्रामीणों को बरनार नदी में रोज कुआं खोदकर पानी पीना पड़ रहा है। जबकि, ग्रामीणों में पंचायत के मुखिया कांता प्रसाद सिंह के प्रति गुस्सा है, ग्रामीणों का कहना है कि मुखिया जी इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। मौरा पंचायत के रहने वाले देवेन्द्र यादव , रामचन्द्र यादव, रामेश्वर शाह, नरेश भगत ,मुस्तफा अंसारी, जीवन लाल समेत कई ग्रामीणों का कहना है कि यहां के लोग इसी नदी के सहारे अपनी प्यास बुझाते हैं, और अपने दिनचर्या के कामों का निष्पादन करते हैं। वहीं, मौरा पंचायत के मुखिया कांता प्रसाद सिंह का कहना है कि पंचायत में नल जल योजना पूरी तरह ठप है, विभागीय उदासीनता के चलते नल जल योजना के लिए आवंटित पैसे वापस चले गए। उन्होंने इस बाबत पीएचईडी विभाग के कार्यपालक अभियंता पर आरोप लगाते हुए कहा कि इस संदर्भ में विभाग को सूचना दी गई है, बावजूद इस ओर कोई कार्रवाई अबतक नहीं की गई है। जिले के अधिकांश भागों में पाए जाने वाले भू-जल में बड़ी मात्रा में खतरनाक रसायनिक पदार्थ जैसे आर्सेनिक और फ्लोराइड पाई जाती है। ऐसे खतरनाक रासायनिक पदार्थ युक्त पानी पीने से इंसानों में गंभीर बीमारी पनप सकता है। हालांकि पीएचईडी विभाग के मुख्य अभियंता बिंदू भूषण ने का कहना है ग्रामीणों की समस्या दूर करने का आश्वासन दिया, औऱ कहा कि जल्द ही मौरा पंचायत की समस्या दूर की जाएगी।

Comments are closed.