जुआफर के गर्भ में छिपा है भारतीय संस्कृति की पुरातनता : प्रो वैद्यनाथ

रिपोर्ट :ब्यूरो राम विलास नालंदा बिहार
नालंदा;-महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य महामोग्गलान के परिनिर्वाण दिवस पर नव नालंदा महाविहार डीम्ड यूनिवर्सिटी नालंदा द्वारा विश्व शांति पदयात्रा का आयोजन सोमवार को किया गया।यूनिवर्सिटी कैंपस से यह पदयात्रा प्रारंभ हुई और जुआफर डीह स्थित पुरातात्विक महत्व स्थल तक गयी।पदयात्रा उपरांत संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. वैद्यनाथ लाभ ने कहा कि जुआफर डीह बहुत पुरानी स्थल है।इसके गर्भ में भारतीय संस्कृति की पुरातनता छिपी है।इस स्थल को नए सिरे से जानने की आवश्यकता है।इसके लिए इसका वृहद उत्खनन आवश्यक है।यह भारतीय संस्कृति की पुरातनता को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत हो सकता है।उन्होंने कहा कि यह स्थल जितना महत्वपूर्ण और प्राचीन है।

उसके अनुरूप इस स्थल और क्षेत्र का विकास नहीं हो सका है। इसके बृहद उत्खनन से नये इतिहास का जन्म हो सकता है।इसके संपूर्ण भूभाग का उत्खनन और संरक्षण की आवश्यकता पर उन्होंने जोर दिया।महामोग्गलान को मुद्गल गोत्र से उत्पन्न भी मानते हैं।इस अवसर पर मोग्गलान और अंतर्राष्ट्रीय शांति यात्रा का औचित्य ” विषयक व्याख्यान में बोलते हुए डॉ. विश्वजीत कुमार ने कहा कि महामोग्गलान धर्म और अधर्म के विभेद को जानते थे।

27 जन्मों में वे बुद्ध के साथ रहे थे।कभी हाथी, कभी बाघ और कभी पक्षी आदि के रूप में. बुद्ध ने सारिपुत्त और मोग्गलान के परिनिर्वाण के बाद कहा था कि अब यह परिषद् सूनी लगती है।उन्होंने कहा यह बौद्धों का तीर्थ स्थल है. तीर्थ स्थल हमारी श्रद्धा के निवेदित करने के स्थल हैं।तीर्थ स्थलों का निर्माण विभिन्न चरणों में हुआ है।जुआफरडीह स्थित बौद्ध टीला का उत्खनन 2006-2007 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पटना अंचल द्वारा कराई गई थी।

उस उत्खनन के दौरान मिले पुरावशेष आश्चर्य जनक रूप से उद्वेलित करती है।उत्खनन में यहां 1400 साल पूर्व की धरोहर के अवशेष मिले हैं।प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि यह है इलाका काफी समृद्ध और संपन्न था।प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से भी अधिक पुरानी होने के प्रमाण मिले हैं।उन्होंने कहा कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नालंदा राजगीर का दालान था।उत्खनन में यहाँ आइरन टूल्स मिल रहे हैं।यहाँ की संस्कृति की खोज अभी बाकी है।

उन्हें लगता है कि जुआफर डीह का यह बौद्ध टीला 1400 ईसा के पूर्व की है. इस स्थल केवल विस्तार से उत्खनन ही नहीं बल्कि इसके संरक्षण की भी आवश्यकता है।उन्होंने कहा कि प्राचीन काल का नालंदा ग्राम जुआफर हो सकता है।कार्यक्रम का शुभारंभ बौद्ध भिक्षुओं के मंगल पाठ से हुआ. समारोह में प्रमुख रूप से मैडम कुलपति डॉ निहारिका लाभ, महाविहार के पूर्व निदेशक डॉ उमाशंकर व्यास, रजिस्टार डॉ सुनील प्रसाद सिन्हा, प्रो राम नक्षत्र प्रसाद, प्रो रवींद्र नाथ श्रीवास्तव परिचय दास, प्रो विजय कर्ण, प्रो सुशिम दुबे, डॉ श्रीकांत सिंह, डॉ विनोद कुमार चौधरी, डॉ हरे कृष्ण तिवारी, डॉ के के पाण्डेय, डॉ दीपंकर लामा, डॉ धम्म ज्योति, डॉ रूबी कुमारी, डॉ मुकेश वर्मा, डॉ प्रदीप दास, डॉ सुरेश कुमार, डॉ सोनम लामो, डॉ अनुराग शर्मा, डॉ राजेश कुमार मिश्र, डॉ जितेंद्र कुमार, भीष्म कुमार, डॉ नरेंद्र दत्त तिवारी, डॉ बुद्धदेव भट्टाचार्य एवं अन्य शिक्षक- शिक्षकेत्तर कर्मी के अलावे शोधार्थी विद्यार्थी और स्थानीय लोग इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

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