दर्जा मिला ,अतिरिक्त संसाधन और आवंटन नहीं

रिपोर्ट ;राम विलास राजगीर।
राजगीर;-विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद भी प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का भग्नावशेष उपेक्षा का शिकार है. इस स्मारक का हाल बदहाल है. रखरखाव बद से बदतर है. विश्व धरोहर की दीवारें कई जगह टूट कर गिर रही हैं. इतना ही नहीं स्मारक और मंदिर की दीवार पर घास से लेकर पेड़-पौधे तक उगे हैं। यह इसके देखभाल और व्यवस्था की पोल खोल रहा है। प्रतिबंध के बाद भी धरोहर की दीवार पर पर्यटकों का चढ़ना और तस्वीर खिंचवाना यहां आम बात है। इसे विश्व धरोहर का दर्जा तो मिला लेकिन संसाधन और आवंटन अबतक नहीं बढ़ा है। नालंदा महाविहार का इतिहास बहुत पुराना है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व से तीर्थंकर महावीर और भगवान बुद्ध तक इसका इतिहास जुड़ा है। यह बुद्ध शिष्य सारिपुत की जन्म और निर्वाण स्थली भी है। पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध समुदाय में प्राच्य कला एवं अध्ययन के लिए महाविहार के रूप में विशेष रूप से यह प्रसिद्ध था। जो सुदूर देशों के छात्रों के लिए आकर्षण का केंद्र था. इनमें चीन के ह्वेनसांग और इत्सिंग भी शामिल हैं. यहां धर्म, विज्ञान, व्याकरण, नीति, खगोल विज्ञान, अध्यात्मवाद और दर्शनशास्त्र जैसे विभिन्न विषय पढ़ाए जाते थे। दुनिया के इस पहले आवासीय विश्वविद्यालय को समकालीन शासकों द्वारा इस प्रयोजन के लिए विशेष रूप से प्रदान किए गए ग्रामों से एकत्रित राजस्व द्वारा चलाया जाता था। इसका अभिलेखीय साक्ष्य उपलब्ध है। धरोहर परिसर में 11 विहार और 6 चैत्य (मंदिर) हैं. एक से तीन तक छोड़ सभी विहार बदहाली का दंश झेल रहा है. इन विहारों की दीवारें हो या कुएं सभी जगह बड़े-बड़े घास के अलावे पेड़-पौधे उगे हैं. इससे धरोहर का सौंदर्य केवल प्रभावित ही नहीं बल्कि बदनामी भी हो रही है. विहार संख्या 4 से लेकर 11 तक की दीवारें हरी चादर ओढ़ रखी है. इस धरोहर की देखभाल के लिए पहले 28 स्मारक परिचर (मल्टी टास्किंग स्टाफ) तैनात थे. उनका काम धरोहर और धरोहर परिसर की रक्षा व देखभाल करना था. तब किसी नहीं कि मजाल नहीं की स्मारक की दीवारों पर सैर करे और फोटो खींचवाए. दीवारें भी घास पात से मुक्त रहती थी. लेकिन कालांतर में उनकी संख्या घटते-घटते मात्र 11 रह गई है. चार अस्थाई और सात अस्थाई हैं. एक स्थाई स्मारक परिचय इसी जनवरी में रिटायर करेंगे. फरवरी से इनकी संख्या तीन रह जाएगी. इन्हीं स्मारक परिचरो के भरोसे विश्व धरोहर की देखभाल होगी. जानकार बताते हैं कि यहां के कर्मचारी रिटायर हो रहे हैं. लेकिन उनकी जगह नियुक्ति नहीं हो रही है. स्मारक रक्षकों के विकल्प के रूप में 12 निजी गार्ड को तैनात किया गया है. इनमें चार गनमैन और आठ लाठी पार्टी हैं।

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सीमित संसाधन और आवंटन से विश्व धरोहर का देखभाल व रखरखाव किया जा रहा है. स्मारक परिचर (मल्टी टास्किंग स्टाफ) की संख्या बहुत कम बची है. नई नियुक्ति नहीं हुई है. दैनिक श्रमिकों से काम कराने पर विभागीय रोक लगी है. धरोहर की दीवारों पर उगे घास पात व अन्य की सफाई ई टेंडर द्वारा कराया जाएगा।
रमेश कुमार, सी.ए., प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय नालंदा।

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