दुनिया में गिरते भूजल स्तर से पर्यावरणविद चिंतित

 

रिपोर्ट;ब्यूरो राम राम विलास।
राजगीर;-दुनिया में भूजल के गिरते स्तर पर नालंदा विश्वविद्यालय में देश-विदेश के पर्यावरणविद् चर्चा कर रहे हैं।स्कूल ऑफ इकोलॉजी एंड एन्वायरनमेंट स्ट्डीज द्वारा आयोजित इस कार्यशाला के पहले दिन पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों ने अपने विचार और सुझाव रखे।इस कार्यशाला का उद्देश्य भूजल के गिरते स्तर की समस्या और उसमें सुधार लाने के उपायों पर विचार-विमर्श करना है।इस कार्यशाला में ऑस्ट्र्लियन सेंटर फॉर इंटरनेशनल एग्रीकल्चरल रिसर्च की मदद से तैयार किए गए एक्विफर स्टोरेज एंड रिकवरी प्रणाली पर मुख्य तौर से चर्चा हो रही है।

नालंदा विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के एक दल ने राजगीर के मेयार और नेकपुर गांव के सात जगहों पर जल संसाधन प्रबंधन के तहत एक्विफर स्टोरेज एंड रिकवरी प्रणाली को तैयार किया है।इसका लोकार्पण 10 फरवरी को कुलपति प्रोफेसर सुनैना सिंह द्वारा मेयार गांव में किया था।कार्यशाला के पहले दिन ऑस्ट्रेलिया के पर्यावरणविद् और विशेषज्ञ डॉ.तमारा जैक्शन, डॉ.पीटर डिल्लोन और डॉ.बसंत महेश्वरी ने एक्विफर स्टोरेज एंड रिकवरी प्रणाली पर अपने विचार रखे।

उन्होंने दुनिया में गिरते भूजल स्तर के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने आने वाले दिनों में होने वाले दुष्परिणम की भी चर्चा की।उन्होंने बताया कि इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए जागरुकता की शुरुआत ग्रामीण स्तर से करनी होगी।उन्होंने खास तौर से भारत में जल प्रबंधन पर किए गए शोध के बारे में बताया। नई दिल्ली के इंडियन एसोसिएशन ऑफ हाइड्रोजियोलोजिस्ट के सचिव डॉ.दिपांकर साहा ने किसानों को जल प्रबंधन के प्रति जागरुक करने पर जोर देते हुए कहा कि भूजल के अत्याधिक दोहन के कारण पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

उनके मुताबिक भूजल के गिरते स्तर के साथ-साथ पानी की गुणवत्ता में भी गिरावट आ रही है।डॉ.साहा ने किसानों को आगाह करते हुए कहा कि अगर रिचार्ज पिट की मदद से भूजल का बेहतर प्रबंधन नहीं किया गया तो आने वाले कुछ वर्षों में खेती के साथ-साथ पीने के पानी नहीं बच पाएगा। कार्य शाला में डॉ.राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा से आए विशेषज्ञ डॉ.रविश चन्द्रा ने भी सौर ऊर्जा की मदद से सिंचाई के बेहतर संसाधनों के बारे में बताया।उन्होंने बताया कि अगर भूजल को संरक्षित करना है तो किसानों को सिंचाई के लिए भूजल की जगह आहर-पाइन, तालाब और नदी जैसे पारंपरिक संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहिए।

दो दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला के पहले दिन चेन्नई के पर्यावरणविद् प्रोफेसर एल.इलान्गो, इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट की जल प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. अदिती मुखर्जी, आत्मा के प्रोजेक्ट डायरेक्टर संदीप राज, मेघ पाइन अभियान के एकलव्य प्रसाद ने भूजल प्रबंधन के बारे में अपने विचार रखा. प्रो.सरनाम सिंह, डॉ.सोमनाथ बंदोपाध्याय, डॉ.प्रभाकर शर्मा, डॉ.अभिराम शर्मा और डॉ.किशोर धावला ने प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने में हुई मुश्किलों की चर्चा की. कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए प्रो सुखबीर सिंह ने भूजल प्रबंधन के बारे में विचार रखा. कार्यशाला में मेयार और नेकपुर गांव के किसान शामिल हुए.

कार्यशाला के दूसरे दिन 26 फरवरी को जल प्रबंधन के विशेषज्ञ मेयार और नेकपुर गांव जाकर वहां विकसित किए गए एक्विफर स्टोरेज एंड रिकवरी प्रणाली का जायजा लेंगे। और वहां किसानों से चर्चा करेंगे।इस प्रणाली से मिलने वाले फायदे के बारे में फीडबैक लेंगे. विश्वविद्याल इन रिचार्ज पिट की मदद से एक जल बैंक बनाने की योजना पर काम कर रहा है।इसका उद्देश्य सर्दियों और सूखे के मौसम में किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना है।

नालंदा विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सुनैना सिंह ने समाज के प्रति नालंदा विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को दोहराया।उन्होंने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय का उद्देश्य न सिर्फ ज्ञान का प्रसार करना है, बल्कि इसका उद्देश्य नई जानकारियों के माध्यम से स्थानीय समाज को विकसित और जीवनशैली को और बेहतर बनाना है।उन्होंने उम्मीद जताई कि एक्विफर स्टोरेज एंड रिकवरी प्रणाली की मदद से यहाँ के भूजल स्तर में न सिर्फ इजाफा होगा , बल्कि किसानों को सिंचाई के बेहतर विकल्प भी मिलेंगे।प्रो. सिंह ने इस प्रणाली को विकसित करने के लिए विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं को बधाई दी और इस प्रणाली को विकसित करने में मदद करने वाले ऑस्ट्र्लियन सेंटर फॉर इंटरनेशनल एग्रीकल्चरल रिसर्च के प्रति आभार जताया।

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