नालंदा सरीखा दुनिया में कोई धरोहर नहीं : पीके मिश्रा

फोटो – परिचर्चा में शामिल प्रमुख लोग।

रिपोर्ट;ब्यूरो राम विलास,नालंदा।
राजगीर;-विश्व गुरु से विश्व धरोहर बना नालंदा को फिर से जगाने, उठाने और पुनर्निर्माण को लेकर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास द्वारा नालंदा कल- आज- कल विषयक राष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन रविवार को किया गया।इसमें देश के जाने-माने पुरातत्वविद, शिक्षाविद एवं बुद्धिजीवी शामिल हुए। पुरातत्ववेत्ताओं ने नालंदा के विश्व धरोहर को विश्व स्तरीय संरक्षित करने के लिए रोड मैप बनाने पर जोर दिया।पूर्व एएसआई निदेशक एवं जाने माने पुरातत्वविद मोहम्मद के के ने कहा कि नालंदा जैसा भारत में दूसरा कोई विरासत नहीं है।इसे संरक्षित करना सरकार और समाज दोनों का दायित्व है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास के अभियान की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार और आवाम को जोड़ने के लिए लोगों की कुंडली जगाने की जरूरत है।इसके लिए डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर जन जन तक आवाज पहुंचाई जा सकती है।तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय की चर्चा करते हुए कहा कि दोनों में काफी अंतर है।तक्षशिला विश्वविद्यालय में केवल अपर जाति के लोग शिक्षा ग्रहण करते थे, जबकि नालंदा विश्वविद्यालय में सभी जाति और धर्म के लोग शिक्षा ग्रहण करते थे।

यही कारण है नालंदा विश्वविद्यालय को काफी प्रसिद्धी मिली थी।नालंदा के अतीत और पुरातात्विक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि आज भी नालंदा के गांवों में हजारों मूर्तियां बिखरी पड़ी है।उसे संग्रह कर पुरातत्व संग्रहालय नालंदा में संजीवनी देने की जरूरत है।मोहम्मद केके ने कहा कि नालंदा के संपूर्ण विकास के लिए सेटेलाइट से फोटोग्राफी कराकर उत्खनन कराने की आवश्यकता है।

जमींदोज विश्वविद्यालय पर बने गांव को उत्खनन कराने से पहले उन्हें पुनर्वासित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि पुनर्वास के दौरान कोई अत्याचार का शिकार न हो इसका भी ख्याल सरकार को रखनी चाहिए।चंडी मौ के पुरातात्विक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध जब राजगीर से सारनाथ जा रहे थे, तब पावारिक आम्रवन में ठहरे थे वह गांव संभवतः चंडी मौ ही था।

— नालंदा में बने इंटरनेशनल लाइब्रेरी और नेशनल म्यूजियम

पूर्व एएसआई निदेशक डॉ फनी कांत मिश्रा ने नालंदा के गौरवशाली के अतीत की चर्चा करते हुए कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय जैसा दुनिया में कोई स्मारक नहीं है।उन्होंने कहा कि नालंदा में तीन गगनचुंबी पुस्तकालय थे।उनकी स्मृति में नालंदा में इंटरनेशनल लाइब्रेरी स्थापित होनी चाहिए।नालंदा के पुरातत्व संग्रहालय को विश्व स्तरीय नहीं तो राष्ट्रीय संग्रहालय बनाने की पहल आवश्यक है।धरोहर की दुर्दशा और रखरखाव पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यह विरासत टूटने के कगार पर पहुंच गया है।

अधिक वर्षा में क्षतिग्रस्त हो रहा है।डॉ मिश्रा ने कहा कि यदि यूनेस्को की टीम नालंदा आएगी तो इसकी दुर्दशा देख विश्व धरोहर के दर्जे को वापस भी ले सकती है।इसलिए सरकार के साथ स्थानीय लोगों के सहयोग से इसे संरक्षित करने की पहल होनी चाहिए।पहले धरोहरों को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किया जाता था।लेकिन वह व्यवस्था आज बिखरती नजर आ रही है।उत्खनन तो जहां तहां की जा रही है, लेकिन उससे अधिक धरोहर साइट उपेक्षित हो रहे हैं।

उन्होंने पुरातत्व विज्ञान को सर्जन से तुलना करते हुए कहा कि उत्खनन और संरक्षण में वही होना चाहिए, जो एक सर्जन ऑपरेशन के दौरान करते हैं।उन्होंने कहा नालंदा के विश्व धरोहर को संरक्षित करने की चुनौती समाज और सरकार दोनों के सामने है।नालंदा को फिर से वैश्विक पटल पर लाने के लिए इमानदार प्रयत्न की जरूरत है।डॉ मिश्रा ने कहा कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय 16 किलोमीटर क्षेत्रफल में बना हुआ था।सरकार, पुरातत्वविद, इतिहासकारों के द्वारा इसकी खोज आजतक नहीं की जा सकी है।

उन्होंने कहा कि जब वह पटना सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद थे, तब उन्होंने इसरो के सहयोग से इसके मुख्य द्वार का पता लगाया था।विश्वविद्यालय के भूमिगत अवशेष को खोज कर एवं उत्खनन कर बहुमूल्य अवशेष प्राप्त किया जा सकता हैं।नालंदा के अतीत की चर्चा करते हुए कहा कि मौर्य काल से अवशेष मिल रही है।नालंदा में बौद्ध विद्या के साथ वैदिक ग्रंथों की भी पढ़ाई होती थी।

— नालंदा के पुस्तकालय जैसी दुनिया के किसी विवि में नौ मंजिला पुस्तकालय नहीं

विश्व भारती शांतिनिकेतन के प्रो सुभाष चंद्र राय ने कहा कि भारतीय संस्कृति, धरोहरों और शिक्षण संस्थान के उन्नयन का परिदृश्य दुखी कर रहा है।कभी विश्व का गौरव रहा नालंदा आज अपनी ही सरकार से उपेक्षित है।शिक्षा के क्षेत्र में अपूरणीय क्षति होने की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृति विरासत और शिक्षा को संभालने के लिए सरकार और समाज दोनों को बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने की जरूरत है।उन्होंने शांतिनिकेतन, बीएचयू, नेतरहाट आदि शिक्षण संस्थानों की चर्चा करते हुए कहा कि तब और अब की शिक्षा व्यवस्था में काफी अंतर है।

यही कारण है कि विरासतों के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है।नालंदा के पुस्तकालय की तरह दुनिया के किसी विश्वविद्यालय में आज भी नौ मंजिला पुस्तकालय नहीं है।विज्ञान विकसित हुआ है।इसके बावजूद समाज और सरकार उससे प्रेरणा नहीं ले रही है।धरोहरों और शिक्षण संस्थानों को बचाने के लिए संकल्प की आवश्यकता है।

– नालंदा सदियों से भारत की पहचान

बीज वक्तव्य देते हुए नव नालंदा महाविहार डीम्ड यूनिवर्सिटी के डॉ श्रीकांत सिंह ने कहां की नालंदा सदियों से भारत की पहचान रही है।नालंदा प्राचीन काल से दुनिया के देशों को संस्कृति से जोड़ने का केंद्र बिंदु रहा है।यहां आदर्श और व्यवहार की शिक्षा दी जाती थी। नालंदा सा उत्कृष्ट शिक्षा केंद्र दुनिया में पहले भी नहीं था और आज भी नहीं है।नालंदा से बड़ा प्रेरणा पुंज कुछ नहीं हो सकता है।वह सांस्कृतिक, दर्शन, कला, विज्ञान, अध्यात्मिकता का सबसे बड़ा केंद्र नालंदा था।उन्होंने कहा कि नई कल्पना के साथ नई उड़ान भरने से ही नालंदा के गौरवशाली अतीत को पुनर्स्थापित किया जा सकता है।

— नालंदा सभ्यता और संस्कृति का द्वार

डॉ विजय राम रतन सिंह ने कहा कि नालंदा सभ्यता और संस्कृति का द्वार है।भारत के वैभवशाली अतीत का प्रतीक है।नालंदा की मिट्टी में विश्व की संस्कृति जमींदोज है।नालंदा के पुनर्निर्माण और नव निर्माण में बुद्धिजीवियों को बढ़-चढ़कर हिस्सा लेनी चाहिए।रायपुर के साहित्यकार गिरीश पंकज ने नालंदा की गौरव गाथा पर आधारित कविता पाठ करते हुए नालंदा के नव निर्माण में सहयोग देने का आश्वासन दिया। इंजीनियर राकेश ओझा ने कहा कि नालंदा के विश्व धरोहर के प्रति विदेशियों में विशेष आस्था है।पंद्रह सौ साल पहले शिक्षा जितनी दीक्षित थी आज इतनी नहीं है।

परिचर्चा के आयोजक न्यास अध्यक्ष नीरज कुमार ने नालंदा को फिर से श्रेष्ठ नालंदा बनाने, नव निर्माण एवं पुनर्निर्माण के लिए देश और प्रदेश के तमाम बुद्धिजीवियों शिक्षाविदों, पुरातत्वविदों, इतिहासकारों और छात्र नौजवानों का आवाहन किया है। उन्होंने कहा कि नालंदा के धरोहर की सुरक्षा, संरक्षा के लिए उनके द्वारा पहल की जा रही है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा गया है।उस पत्र के बाद संस्कृति मंत्रालय द्वारा कई कार्य आरंभ किए गए हैं।इस धरोहर को एनसीएफ से जोड़ा गया है।विश्व धरोहर नालंदा की टूटी चहारदीवारियों का पुनर्निर्माण और धरोहर के ऊपर उगी घास पात को की निराई की जा रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के उद्घोष उठो नालंदा उठो का मंत्र अपनाकर नालंदा के अतीत और विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएगा।अंत में बरिष्ट पत्रकार राम विलास द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया।

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