निर्वाण से पहले सारिपुत ने माता को दिया था बौद्ध धर्म की दीक्षा

फोटो – कार्यक्रम में शामिल शिक्षाविद

रिपोर्ट : ब्यूरो राम विलास नालंदा बिहार।
नालंदा;-नव नालंदा महाविहार डीम्ड यूनिवर्सिटी नालंदा में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर भगवान बुद्ध के प्रिय शिष्य सारिपुत्र का महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया गया।इस अवसर पर सारिपुत्र के जीवन और धर्म के प्रचार में उनके योगदान विषय पर विशेष व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया।समारोह के मुख्य वक्ता अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ श्रीकांत सिंह ने कहा कि सारिपुत्र मगध के महान व यशस्वी शिष्य थे।

उन्होंने बौद्ध धर्म को न केवल एक नई ऊंचाई दिया, बल्कि उसका संरक्षण और व्यापक प्रचार प्रसार भी किया। \दुनिया आज भी उनके गूढ़ ज्ञान का कायल है।स्वयं भगवान बुद्ध भी सारिपुत के ज्ञान की प्रशंसा करते अघाते नहीं थे।इसलिए सारिपुत्र के अनेक प्रवचनों को उन्होंने अनुमोदन कर बुद्ध वचन का दर्जा दिया था।डॉ श्रीकांत ने कहा कि कार्तिक पूर्णिमा का महत्व जितना बौद्ध धर्म में है उतना ही सनातन और सिख धर्म में है।

सारिपुत्र के निर्वाण दिवस होने के कारण बौद्ध धर्म में इसका बहुत महत्व है. इसी प्रकार सिख धर्म के अधिष्ठाता गुरु नानक जी का जन्मदिन है।सिख र्मावलंबी इस तिथि को बड़ी धूमधाम से जयंती के रूप में मनाते हैं।सनातन धर्म में पूर्णिमा के स्नान का बहुत महत्व है।कार्तिक पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।इस तिथि को सनातन धर्मावलंबी गंगा नदी एवं सरोवरों में स्नान कर देवालय मैं भगवान विष्णु व लक्ष्मी नारायण की पूजा अर्चना करते हैं।

सारिपुत्र वह धर्म के अभ्यास और बौद्ध मठों में अद्भुत अनुशासन लागू किए थे।वे अपने शिष्यों को भी ज्ञान से सदा आलोकित करते रहे. बीमार पड़ने पर वे लोगों की सेवा करने से भी नहीं चूकते थे।उन्होंने कहा कि महापरिनिर्वाण के पूर्व सारिपुत्र अपने जन्म स्थान आए थे। उन्होंने अपनी मां को बौद्ध धर्म की दीक्षा प्रदान किया था।इस प्रकार मातृ रीण चुकाने के बाद ही उन्होंने निर्वाण को प्राप्त किया था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर वैद्यनाथ लाल ने कहा कि सारिपुत्र ज्ञान की तलाश में राजगीर की ओर निकले थे।वहां गुरु संजय विलठ से उनकी मुलाकात हुई।लेकिन वे उनसे संतुष्ट नहीं हो पाए तब वे दूसरे गुरु की तलाश में चलते हुए राजगीर पहुंचे।राजगीर में भगवान बुद्ध के शिष्य यसाजी से उनकी मुलाकात हुई, जिसने उन्हें बुद्ध के बारे में बताया।उन्होंने बताया कि संसार की हर वस्तु कारणों से उत्पन्न है।

कारणों के समाप्त होने से वे समाप्त हो जाते हैं. सब कुछ क्षणभंगुर है।फिर वे अपने मित्र मोग्लान के साथ वेणुवन में महात्मा बुद्ध से मुलाकात किये।वे भगवान बुद्ध से प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गए।कार्यक्रम का संचालन बौद्ध अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर राणा पुरुषोत्तम कुमार सिंह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन रजिस्ट्रार डॉ एसपी सिन्हा ने किया।

इस अवसर पर डॉ निहारिका लाभ, डॉक्टर हरे कृष्ण तिवारी, डॉक्टर रूबी कुमारी, डॉ विश्वजीत कुमार, प्रोफ़ेसर परिचय दास, डॉक्टर प्रदीप दास, डॉक्टर के के पांडे, डॉक्टर नरेंद्र दत्त तिवारी, डॉ विनोद चौधरी, राजेश कुमार मिश्र, डॉक्टर प्रदीप दास, भीष्म कुमार सहित विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी उपस्थित थे।

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