मीडिया प्रधान देश में कृषि नहीं, राजनीति की प्रधानता


भारत को भले ही कृषि प्रधान देश कहा जाता रहा हो और देश की 80 प्रतिशत जनता कृषि पर आधारित हो, लेकिन कृषि पर कभी भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया। अब चर्चा शुरू हुई है तो किसानों के जीवन स्तर पर गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा है। मीडिया प्रधान देश में कृषि की प्रधानता की जगह राजनीति की प्रधानता हावी हो गई है।

नौकरी पेशा लोगों की आय जहां 21 गुना बढ़ चुकी है, वहीं किसानों की आय दो गुनी करने पर कुछ इस प्रकार जुमले छोड़े जा रहे हैं जैसे अन्नदाता पर कोई एहसान किया जा रहा है। और वह भी 2022 तक। कृषि विधेयकों पर राज्यसभा में मुहर लग गई, लेकिन किसानों के लिए एक निश्चित एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात तय नहीं हो पाई है।

कारपोरेट उत्पादों पर आप एमआरपी यानी अधिकतम खुदरा मूल्य लिखा देखते हैं। उसका मतलब है कि जिस उत्पाद पर एमआरपी लिखा है, उससे अधिक दाम पर उसे नहीं बेचा जा सकता। क्या किसानों के लिए सरकार ऐसा तय कर पाएगी कि उनके उत्पाद को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर नहीं खरीदा जा सकेगा। जो उससे कम पर खरीदेगा या खरीदने की कोशिश करेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी?

शायद इसीलिए कृषि विधेयकों पर देश भर में संसद से लेकर सड़क तक बवाल मचा हुआ है। केंद्र सरकार ने तमाम नियमों को ताक पर रख कर कृषि विधेयकों को राज्यसभा से भी पारित तो करा दिया है और पूरी संभावना है कि वह कानून भी बन जाएगा, लेकिन क्या उससे किसानों की दशा सुधर पाएगी? अगर ऐसा न हुआ तो सरकार को उसका बड़ा खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। क्योंकि देश का किसान अब जागरूक हो चुका है।

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कृषि क्षेत्र में कोई काम ही न हुआ हो। हरित क्रांति और स्वेत क्रांति से लेकर कृषि क्षेत्र में बदलावों की एक लंबी पृष्ठभूमि है। इसके बावजूद किसानों की दशा में सुधार नहीं हो पाया। कृषि अभी भी मजबूरी का नाम महात्मा गांधी बनी हुई है।

दरअसल, कृषि का विकास कम से कम 7000-13000 ईसा पूर्व हो चुका था। तब से अब तक बहुत से महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुके हैं। कृषि भूमि को खोदकर अथवा जोतकर और बीज बोकर व्यवस्थित रूप से अनाज उत्पन्न करने की प्रक्रिया को कृषि अथवा खेती कहते हैं।

मनुष्य ने पहले-पहल कब, कहां और कैसे खेती करना शुरू किया, इसका उत्तर सहज नहीं है। सभी देशों के इतिहास में खेती के विषय में कुछ न कुछ कहा गया है। कुछ भूमि अब भी ऐसी है जहां पर खेती नहीं होती। जैसे, अफ्रीका और अरब के रेगिस्तान, तिब्बत एवं मंगोलिया के ऊँचे पठार और मध्य आस्ट्रेलिया। कांगो के बौने और अंदमान के बनवासी खेती नहीं करते।

आदिम अवस्था में मनुष्य जंगली जानवरों का शिकार कर अपनी उदरपूर्ति करता था। बाद में उसने कंद-मूल, फल और स्वत: उगे अन्न का प्रयोग शुरू किया। इसी अवस्था में किसी समय खेती से अन्न उत्पादन करने का आविष्कार किया होगा।

फ्रांस में जो आदिमकालिक गुफाएं प्रकाश में आई हैं, उनके उत्खनन और अध्ययन से ज्ञात होता है कि पूर्वपाषाण युग में ही मनुष्य खेती से परिचित हो गया था। बैलों को हल में लगाकर जोतने का प्रमाण मिश्र की पुरातन सभ्यता से मिलता है। अमेरिका में केवल खुरपी और मिट्टी खोदने वाली लकड़ी का पता चलता है।

भारत में पाषाण युग में कृषि का विकास कितना और किस प्रकार हुआ था, इसकी कोई जानकारी नहीं है। लेकिन सिंधु नदी के काँठे के पुरावशेषों के उत्खनन से इस बात के प्रचुर प्रमाण मिले हैं कि आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व कृषि अत्युन्नत अवस्था में थी और लोग राजस्व अनाज के रूप में चुकाते थे।

ऐसा अनुमान पुरातत्वविद् मोहन जोदड़ो में मिले कोठरों के आधार पर लगाते हैं। वहां से उत्खनन में मिले गेहूं और जौ के नमूनों से उस प्रदेश में उन दिनों इनके बोए जाने का प्रमाण मिलता है। वहां से मिले गेहूं के दाने ट्रिटिकम कंपैक्टम अथवा ट्रिटिकम स्फीरौकोकम जाति के हैं।

इन दोनों ही प्रजाति के गेहूं की खेती आज भी पंजाब में होती है। यहां से मिला जौ हाडियम बलगेयर प्रजाति का है। उसी प्रजाति के जौ मिश्र के पिरामिडों में भी मिलते हैं। कपास के लिए सिंध की आज भी ख्याति है। क्योंकि यह उन दिनों भी प्रचुर मात्रा में पैदा होता था। कृषि के इतने प्राचीन इतिहास के बावजूद किसान बेबस है, जबकि कारपोरेट जगत थोड़े ही दिनों में फलने फूलने लगता है। ऐसा राजनीति की अनीति की वजह से होता आया है।

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