राजगीर की वादियों में दफन कई काल खंडों का इतिहास

राजाओं के किलावशेष की अबतक खोज नहीं !

रिपोर्ट;ब्यूरो राम विलास, राजगीर।
राजगीर;-ऐतिहासिक पटपरिवर्तनों की साक्षी राजगीर में कई काल खंड का इतिहास जमीनदोज है. राजगीर उत्थान- पतन जितनी बार देखा है , उतना शायद और किसी नगर ने नहीं देखा होगा. अनेक बार यह उजड़ा, बना, बसा और पुनः धराशायी हुआ है. इतिहास इसका गवाह है. जमीनदोज पुरावशेषो में से कुछ की खोज की गई है और बहुतो की खोज अभी बाकी है. यहां के पुरावशेष, मंदिर, गर्म जल के झरने, जंगल, झील और पहाड़ियां बिना बोले राजगीर की पुरानी गौरव गाथा सुना रहे हैं. शेष बचे ऐतिहासिक साक्ष्यो को खोजने में सरकार, समाज, इतिहासकार और जनप्रतिनिधियों की कोई रुचि नहीं है. यही कारण है कि आजादी के 73 साल बाद भी इसके खोज लिए किसी स्तर पर प्रयास नहीं किया गया है. जरासंध अखाड़ा, जरासंध बैठक खाना, जीवक अम्रवन, आजातशत्रु किला, अजातशत्रु स्तूप, बिंबिसार कारागार, वेणुवन, मणियारमठ, सोन भंडार की खोज की गयी है, लेकिन आजातशत्रु को छोड़ अन्य मगध सम्राट राजा बसु, बृहद्रथ, जरासंध बिंबिसार आदि के किला की खोज अबतक नहीं हो सकी है या खोजने का प्रयास ही नहीं किया गया है. चीन की दीवार से करीब 500 साल पुरानी साइक्लोपिनियन वाल राजगीर की सभी पहाड़ियों पर 45 किलोमीटर लंबी बनाई गई थी. राजगीर के स्वर्ण गिरी और उदयगिरी पहाड़ी छोड़कर अन्य पहाड़ियों पर साइक्लोपिनियन वाल कहीं नजर नहीं आता है. उस पुरावशेष को खोजने, सहेजने और बचाने का प्रयास नहीं हो रहा है. राजस्थान के राजाओं की किले की तरह राजगीर के राजाओं का किलावशेष या अन्य पुरावशेष कहीं नहीं दिखता है. प्राचीन भारत के 16 प्रमुख जनपदों में सबसे शक्तिशाली मगध साम्राज्य की ऐतिहासिक राजधानी का यह हाल है. राजगीर जितना पुराना है इसकी दास्तान भी उतनी ही गौरवशाली मनोरंजक और पुरानी है. अनादि काल से मगध सामराज्य की राजधानी रही राजगीर समय-समय पर अनेक कालजयी सम्राटो, प्रतापी राजाओं, योद्धाओं, चिंतकों, विचारको, विद्वानों, संतों, महात्माओं, समाज सुधारको एवं राजनीतिज्ञों को पनपाया है, जिनकी अमिट छाप प्राचीन काल में संपूर्ण भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी देखी गई है. अनेको प्रतापी राजाओ की राजधानी रही पंच पहाड़ियों से घिरी प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण राजगीर का बाहर के नगरो, एशिया एवं यूरोपीय देशों के साथ आज भी सांस्कृतिक संबंध प्रगढ़ है. यह बौद्ध एवं जैन धर्म का प्रमुख केंद्र के अलावे हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख धर्मावलंबियों का प्रमुख तीर्थस्थान भी है. इसके वैभव, गौरवशाली इतिहास को जान सुन कर सैलानी गौरवान्वित होते हैं. देश दुनिया से आने वाले सैलानी मगध सम्राटो के किला एवं अन्य विरासतो को देखना चाहते हैं, लेकिन चाहकर भी उसका दीदार नहीं हो पाता है. हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पहल से सैलानियो को आकर्षित करने के लिए इक्को टूरिज्म, जू सफारी, नेचर सफारी, वेणुवन का विस्तार, आठ सीट वाली रोपवे आदि अनेकों निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं. बावजूद राजाओं का किलावशेष आदि की खोज अभी बाकी है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और संस्कृति मंत्रालय की गतिविधियां सुसुप्त है. आम से लेकर खास लोग और जनप्रतिनिधि से लेकर केंद्र सरकार तक राजगीर के प्रति संवेदनशील नहीं दिखते हैं .

— मगध सम्राटो की प्रतिमा लगाने से बदलेगा राजगीर का लुक

नालंदा. मगध साम्राज्य की राजधानी राजगीर में मगध सम्राट बृहद्रथ, जरासंध, बिंबिसार, अजातशत्रु, चंद्रगुप्त, अशोक, चाणक्य आदि की आदमकद प्रतिमा लगाने की मांग बुद्धिजीवियों और संस्कृति प्रेमियों द्वारा लंबे समय से की जा रही है. इन राजाओं की प्रतिमा लगाने से केवल राजगीर का लुक ही नहीं बदलेगा, बल्कि राजगीर आने वाले देशी – विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण, ऐतिहासिक और यादगार भी होगा. राजस्थान और जम्मू के राजाओं की तरह राजगीर में भी मगध सम्राट का दीदार हो सकेगा. हालांकि ‘प्रकृति’ के अनुरोध पर सीएम नीतीश कुमार द्वारा कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के प्रधान सचिव को इस दिशा में कारवाई के लिए आदेश दिया गया है.

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