षष्ठी देवी एवं भगवान भास्कर का संयुक्त पर्व है ”छठ महापर्व”

रिपोर्ट;ब्यूरो राम नरेश ठाकुर,[बिहार]
पटना;-सनातन धर्म में हर ऋतू एवं प्र्तेक मास में किसी ना किसी पर्व का मनाया जाना धर्माबलंवियों के जीवन काअभिन्न अंग रहा है। किन्तु कार्तिक मास का अपना अलग महत्व है।प्रकृति में वनस्पति, औषध, कृषि और उसके उत्पाद के ज्ञान की धारा लिए पूरा महीना ही महा पर्व है।अन्नकूट के मूल में जो धारणा है,वह इस ऋतु में उत्पादित धान्य और शाक के सेवन आरंभ करने की भी है।अन्न बलि दिए बिना खाया नहीं जाता, इसी में भूतबलि से लेकर देव बलि तक जुड़े और फिर गोवर्धन पूजा का दिन देवालय देवालय अन्नकूट का चलन प्रारंभ हो गया।दीपावली से छठ महा पर्व ,फिर मास का समापन सामा चकेवा,उपरांत पूर्णिमा गंगा स्नान के साथ संपन्न होना कार्तिक माह के महत्त्व को एकअलग पहचान दिलाता है।

सूर्य के साथ षष्ठी देवी की पूजा का सम्वन्ध ;-

वैसे तो छठ अब केवल बिहार का ही प्रसिद्ध लोकपर्व नहीं रहा इसका फैलाव देश-विदेश के उन सभी भागों में हो गया है, जहां इस प्रदेश के लोग जाकर बस गए हैं।इसके बावजूद बहुत बड़ी आबादी इस व्रत की मौलिक बातों से अनजान है।श्वेताश्वतरोपनिषद् में बताया गया है कि परमात्मा ने सृष्टि रचने के लिए स्वयं को दो भागों में बांटा। दाहिने भाग से पुरुष, बाएं भाग से प्रकृति का रूप सामने आया। ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्ठी है।पुराण के अनुसार, ये देवी सभी बालकों की रक्षा करती हैं और उन्हें जन्म के छठे दिन लंबी आयु का वर देती हैं।

षष्ठी देवी को ही स्थानीय बोली में छठ मैया कहा गया है।षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं।और सभी बालकों की रक्षा करती हैं।आज भी देश के बड़े भाग में बच्चों के जन्म के छठे दिन षष्ठी पूजा या छठी पूजा का चलन है।सूर्यषष्ठी व्रत में ब्रह्म और शक्ति (प्रकृति और उनके अंश षष्ठी देवी), दोनों की पूजा साथ-साथ की जाती है।इसलिए व्रत करने वालों को दोनों की पूजा का फल मिलता है।यही बात इस पूजा को सबसे खास बनाती है।

— भगवान राम ने की थी छठ पूजा
कहा जाता है की राम रावण युद्ध में एक समय ऐसा आया जब युद्ध के द्रष्टा देवताओ में हड़कंप मच गया,देवताओ को लगा युद्ध करते करते भगवान थक चुके हैं। तब सभी देवताओं द्वारा देवगुरु बृहश्पति के परामर्श सेअगस्त ऋषि को भगवान श्री राम के पास भेजा गया।अगस्त ऋषि द्वारा भगवान राम को भगवान भास्कर काआदित्य मंत्र प्राप्त हुआ। इसी आदित्य मन्त्र का मात्र तीन वार जाप कर श्री राम द्वारा अपने बान से रावण का वध किया गया।

जब श्रीराम लंका पर विजय करके वापस अयोध्या आए तो उन्होंने अपने कुलदेवता सूर्य की उपासना की।उन्होंने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि पर व्रत रखा। सरयू नदी में डूबते सूर्य को अर्घ दिया। सप्तमी तिथि को भगवान श्री राम ने उगते सूर्य को अर्घ दिया। इसके बाद से आम जन भी इसी तरह से भगवान सूर्य कीआराधना करने लगे। जो छठ पूजा के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार दुर्योधन ने अपने मित्र कर्ण को अंग देश का राजा बना दिया था। कर्ण, कुन्ती और सूर्यदेव के पुत्र थे, इसलिए वे सूर्य देवता की उपासना करते थे। कर्ण नियम पूर्वक कमर तक पानी में जाकर सूर्य देव की आराधना करते थे और दान देते थे। माना जाता है कि षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सूर्य देवता की विशेष पूजा करते थे। अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देवता की पूजा करने लगे।धीरे-धीरे यह पूजा पूरे क्षेत्र में की जाने लगी ,और इसे छठ पूजा का नाम दिया गया।

एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।

मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्घि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है।

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