चुनावी समर से पहले बीएसपी को नमस्ते कर बीजेपी में शामिल होने वाले बड़े नाम….


लोकसभा चुनाव की तारीखों का एलान हो चुका है।एलान के साथ ही नेताओं में भगदड़ भी शुरू हो चुकी है।सबसे ज़्यादा हलचल बीएसपी के खेमे में है जहां से नेता भाग-भागकर बीजेपी में शामिल हो रहे हैं।आइए आपको बताते हैं कि यूपी में वो कौन से बड़े नाम हैं जिन्होंने पिछले दिनों मायावती को छोड़कर मोदी में भरोसा जताया है.

नेताओं के भगदड़ की स्थिति उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा देखने को मिल रही है।उत्तर प्रदेश में 80 सीटों पर घमासान होना है जिसमें राष्ट्रीय दलों के अलावा स्थानीय पार्टियां भी जोर -अजमाइस कर रहे हैं ।अब तक उत्तर प्रदेश के 28 बड़े नेता अपनी पार्टियों से टूटकर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं।सबसे ज्यादा 15 बड़े नेता मायावती को छोड़कर गए हैं। इनमें 11 तो ऐसे हैं जो हाथी के निशान पर चुनाव में किस्मत आज़मा चुके हैं.

बतादें की समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के मिलकर चुनाव लड़ने के फैसले के बाद दोनों ही पार्टियों के कई संभावित उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने की संभावना खत्म हो गई।इसी के चलते उम्मीदवारों ने बीजेपी में अपना भविष्य टटोलना शुरू किया है।गठबंधन के मुताबिक बीएसपी 38 जबकि अखिलेश 37 सीटों पर प्रत्याशी खड़ा करने पर सहमत हुए हैं।बीजेपी ने समाजवादी पार्टी और बीएसपी के तालमेल से बने असंतोष के माहौल को कैश करना चाहा है और पार्टी छोड़नेवालों को अपने यहां जगह दी है.मायावती का दामन छोड़कर गए बीएसपी के बड़े नेताओं में बड़ा नाम विजय प्रकाश जायसवाल का है जो 12 मार्च को भाजपाई हो गए।पिछले चुनाव में जायसवाल ने वाराणसी में मोदी के सामने ताल ठोक कर 60,579 वोट हासिल किए थे।2019 में ये सीट समाजवादी पार्टी के खाते में गई है, जिसकी वजह से जायसवाल की एक बार फिर चुनाव लड़ने की इच्छा धूल में मिल गई.बीएसपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे उम्मेद प्रताप सिंह भी बीजेपी में चले गए।प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।उम्मेद को उम्मीद थी कि बहनजी लोकसभा चुनाव में भी उन पर मेहरबान होंगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं.बीएसपी के संस्थापक सदस्य रामहेत भारती ने भी बीजेपी ज्वाइन कर ली है।सीतापुर में वो बड़े दलित नेता माने जाते हैं।मायावती सरकार में उनके पास मंत्री पद भी था।2007 और 2012 विधानसभा चुनाव में उन्होंने हरगांव सीट से जीत भी दर्ज की थी लेकिन 2017 में वो हार गए.

नहीं मिला टिकट तो बदल ली पार्टी…….
तीन बार विधायक रहे छोटेलाल वर्मा ने भी बहनजी को झटका दिया।2012 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को फतेहाबाद से हराया था।वर्मा को फतेहपुर सीकरी से बीजेपी का टिकट मिलने की आस है.गौतमबुद्धनगर के नेता वेदराम भाटी को इस बार मायावती से टिकट की जगह निराशा हाथ लगी तो वो भी चल दिए।साल 2012 में उन्होंने जेवर से जीत दर्ज की थी लेकिन 2017 में वो जीत का सिलसिला बरकरार नहीं रख सके।लोकसभा चुनाव में मायावती ने उन्हें तवज्जो देना ज़रूरी नहीं समझा.आगरा के दलित नेता गुटियारी लाल दुवेश की कहानी भी लगभग ऐसी ही है।वो 2012 में विधायक बने लेकिन 2017 में हार गए।इस बार उनको भी अहमियत मिलती नहीं दिखी तो उन्होंने पार्टी बदलने में भलाई समझी.

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