आदर्श चवा की अस्पताल में रात को सात बजे लग जाता है ताला


रिपोर्ट-भुट्टाखान
बाड़मेर-अपने स्वास्थ्य को लेकर हर व्यक्ति के मन में गंभीरता होगी पर कुछ मामलों में भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर ही हमारी सहनशीलता को ना समझे तो हम किसको दोष दें जिले भर में ऐसे कहीं पीएचसी अस्पताल उप स्वास्थ्य केंद्र है जहां पर स्टाफ व कर्मचारी अन्य उपस्थित मिलेंगे बाड़मेर जिले में एक ऐसा भी गांव हैं जिसका नियम अलग है।एक आम दुकान की तरह रात्रि होते ही जैसे दुकान का स्वेटर दरवाजा बंद कर दिया जाता है या यूं कहे उस दुकान को रात होते ही दुकानदार बंद करके अपने घर चला जाता है इसी तरह बाड़मेर जिले से लगभग 30 किलोमीटर दूर ग्राम चवा में ऐसा ही है जहां का हॉस्पिटल किसी दुकानदारी से कम नहीं कहने को यह अस्पताल सरकारी है पर यहां कार्यकर्ताओं एवं समस्त स्टाफ अपनी मनमानी कर ड्यूटी पर आते हैं जब रात्रि को न्यूज़ टीवी इंडिया की टीम चवा आदर्श गांव पहुंची तो वहां का नजारा देख हम भी चपेट में रह गए कि यह एक सरकारी अस्पताल है यह सवाल हमें भी उन जवाब को ढूंढने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था कि अगर यहां यह हाल है तो यहां के ग्रामीणों को इलाज के लिए रात्रि में बाड़मेर या आस-पास के गांव में जाना पड़ता राजकीय प्राथमिक आदर्श चवा अस्पताल में रात्रि के 8:00 बजने के बाद यहां ताला लग जाता है।

रात्रि के बाद अस्पताल में लग जाता है ताला रात्रि में भी इमरजेंसी में दो से तीन कर्मचारियों को अस्पताल में रहना अनिवार्य है परंतु डॉक्टर साहब दिन में भी ड्यूटी देने से रहे रात्रि में तो ताला जड़े घर जाकर सो जाते हैं डॉक्टर को इस बात से क्या यहां कार्यकर्त डॉक्टर समय पर नहीं देता है ड्यूटी आदर्श चवा अस्पताल में कुल 17 स्टाफ है जिनमें तीन चार कर्मचारी ड्यूटी पर आते हैं यहां डॉक्टर की पोस्ट पर आलिया एक ही डॉक्टर है जो पास के गांव के ही है जो समय पर ड्यूटी देने से रहे।
जब इस बारे में हमने रात्रि मैं कई ग्रामीणों उसे इस बात पर मंथन किया तो उन्होंने बताया कि कहने को तो यह अस्पताल है पर यहां अस्पताल के डॉक्टर एवं कुछ कर्मचारियों की मनमानी चलती है ना समय पर ड्यूटी है ना इलाज को लेकर कोई माननीय सकती है बस नाम का ही रात में एक भी कर्मचारी नहीं रहता अस्पताल में रात्रि के तुरंत बाद इस अस्पताल में कोई अस्पताल संबंधित कर्मचारी नहीं होता डॉक्टर की तो बात ही क्या करें यहां उपस्थित एनएम कंपाउंडर ताला लगाकर अपने-अपने क्वार्टर या घर चले जाते और सुबह होते 10:00 बजे अस्पताल का दरवाजा खोला जाता कहने को तो इस अस्पताल में कुल 17 कर्मचारी डॉक्टर समेत परंतु उपस्थिति दिन में तीन-चार की ही रहती है।
रात्रि में कोई परामर्श इमरजेंसी हो तो जाना पड़ता है 30 किलोमीटर बाड़मेर गांव में किसी को भी अगर रात के बाद डॉक्टर की परामर्श हेतु सुविधा या या महिला गर्भवती जांच परामर्श आदि हेतु बाड़मेर जिले का रुख करना पड़ता है क्योंकि 7 से 8:00 बजे तक अस्पताल परिश्रम का दरवाजो पर ताला लग जाता है।
अगर मरीज को बीच रास्ते में ही कुछ घटित हो जाए तो उसका जिम्मेदार कौन होगा परंतु इससे अस्पताल प्रशासन या चिकित्सा विभाग प्रशासन को क्या
ग्रामीणों का क्या कहना ग्रामीणों का कहना है कि हमने इस बारे में यहां उपस्थित कर्मचारियों को एम डॉक्टर को अवगत कराया डॉक्टर यहां के के रहवासियों होने के कारण गांव वालों ने इस बात को मुख्य बिंदु के रूप में नहीं लिया परंतु जब जान पर बन आए तो हम क्या करें हमें इलाज के लिए बाड़मेर जाना पड़ता है कई बार तो हमें दिन में भी यहां असुविधा का सामना करना पड़ता है अस्पताल में नहीं कोई कर्मचारी रहता है नहीं कोई सुविधा है हमारी प्रशासन से गुहार है कि अस्पताल चौबीसों घंटे खुला रहे हैं हमें स्वास्थ्य संबंधित हर सुविधा मिले चिकित्सा विभाग क्यों है शांत बाड़मेर जिला चिकित्सा विभाग क्या सत्य को असत्य के रूप में क्यों ले रहा है क्या इस बात से विभाग का कोई भी कर्मचारी वाक्य नहीं रखता सवाल कहीं हैं पर जवाब कुछ नहीं सिवाय ग्रामीणों के वह दुख भरे आंसू जब उन्हें यहां सुविधा के रूप में बस अस्पताल के बाहर एक ताला लगा मिलता है।

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