समाज के ठेकेदारों के लिए हानिकारक है “आर्टिकल 15”

जी हां, इसे कहने के पीछे कोई रंजिश या मेरा अपना बुरा अनुभव नहीं रहा है, बस जो महसूस हुआ वह कह देना ज़रूरी लगा. ठेकेदारों के लिए हानिकारक हैं, क्योंकि वे फिल्म, कलाकार, कहानी, निर्देशक सभी को जी भरकर गालियाँ तो दे सकते हैं पर अपने गिरेबान में झांककर सच की पड़ताल नहीं कर सकते. यह फिल्म उनकी कथनी और करनी की सच्चाई पेश करती है. अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी की लिखी आर्टिकल 15 की कहानी उत्तर प्रदेश की सच्ची घटनाओं से प्रेरित है. सामाजिक समानता की दोहाई देने वालों ने निचले तबके के साथ किस तरह का समाज साझा किया है इस फिल्म में इस बात को बखूब दिखाया गया है. फिल्म की ख़ासियत यह भी है कि यह स्टीरियो टाइप फिल्म बनने से बच गई. यहां अन्याय से लेकर न्याय तक में हर किसी की भूमिका को सामान तौर पर दर्शाने में कामयाबी मिली है. हमारे ही बीच किस तरह वह लोग भी शामिल हैं, जैसे कि निहाल सिंह और ब्रह्मदत्त नाम का किरदार जो ख़ुद दलदल में हैं और उन्हीं से हम कीचड़ साफ़ करने की उम्मीद भी करते हैं.

फिल्म शुरू होती है 3 दलित लड़कियों के अगवा होने से, जिसकी एफ़आईआर तक लिखने में पुलिस वालों को कोई इंटरेस्ट नहीं होता. बड़ी गहमा गहमी के बाद आख़िर में लड़की के पिता को ही थाने में बुलाकर गुनाह कुबूल करने और जेल भेजने के बाद ओपन केस है कहकर क्लोज कर देने की कार्यवाई का वास्तविक उदाहरण अक्सर हम आय दिन पढ़ते, सुनते, देखते ही रहते हैं. “ये लोग ऐसे ही होते हैं” इस वाक्य को फिल्म में आप कई बार कहते सुनेंगे. वह भी एक दलित तबके से आये पुलिस अफसर की ज़ुबान से, और हर बार इसे कहने के पीछे आपको इसके पीछे का गहरा रहस्य समझ में आएगा. मजदूरी में 3 रुपए बढ़ाने की मांग पर बलात्कार और ह्त्या, कई दिनों तक अत्याचार सहकर बची एक 15 साल की बच्ची और एनकाउंटर में दलित समाज के 2 सक्रिय लोगों की ह्त्या जैसे मुद्दों को आप झुठलाने की कोशिश कर भी लें, तब भी आर्टिकल 15 में ऐसे कई पहलुओं को इतनी बारीकी से दर्शाया गया है, जिसे आप झुठलाने की हिम्मत नहीं कर सकते.

आर्टिकल 15 में पेड़ पर लटकी लाश, हड़ताल से जमा होती गंदगी, नाली में डूबकर कचरा निकालता दलित कर्मचारी, छुआ-छूत के चलते खाने की अलग प्लेट और बोतल, महंत जी का मिलन समारोह में अपना खाना और बर्तन साथ लेकर आना, एक बाप का कहना कि ‘कुछ दिन रखकर यानी बलात्कार करके छोड़ देते, जान से क्यों मार दिए’, हम इन्हें जो दें, वही उनकी औकात है, रिजर्वेशन की व्यवस्था तो है, क्यों नहीं आगे आते, यह देखों हमारे पिता झाड़ू लगाते थे हम आगे आए ना? तुम लोग ऐसे ही हो, जैसे तमाम संवाद और दृश्य नज़र आते हैं, जहां कान सन्न और आँखे फटी की फटी रह जाती हैं.
सामाजिक विषमता से लेकर प्रशासन व्यवस्था की सच्चाई को जानना है तो Article 15 आपके लिए है. यह फिल्म एक तरफ़ा संवाद नहीं करती, किसी एक जाती विशेष को दोषी भी नहीं ठहराती, बल्कि यह फिल्म वर्चस्व की लड़ाई पर आधारित है. आर्टिकल 15 के हर दृश्य में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि मौका मिलने पर हम गुनाह करने या सहने में बराबर के भागीदार हैं.अयान रंजन और निषाद सहित सभी कलाकारों ने अपने किरदार को बेहतरीन ढंग से जिया है. आयुष्मान खुराना ने पहली बार सीरियस भूमिका निभाई और दर्शकों को बता दिया कि वे सिर्फ़ कॉमेडी के लिए ही नहीं बने हैं. आर्टिकल 15 आपके ख़र्च किए गए एक-एक रूपए और मिनट को जस्टिफ़ाई करता है. इंटरवल में भी आप पॉपकॉर्न की तरफ शायद न दौड़ें क्योंकि फर्स्ट हाफ़ का ट्रीटमेंट आपके दिमाग़ में गहरा असर छोड़ चुका होता है.

 

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