रहमत,मगफिरत,इबादत,बरकत और अल्लाह को राजी करने का महीना है रमज़ान


रिपोर्ट,मो.अंजुम आलम,जमुई (बिहार)
जमुई:-इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार रमज़ानुल मुबारक का महीना नौवां महीना है।जो इबादत और बरकत वाला है।इस्लामिक 12 महीनों में रमज़ान के महीने का एक अलग महत्व है।रमजानुल मुबारक के महीने की शुरुआत चांद देख कर की जाती है।इस महीने की फ़ज़ीलत कुछ और ही है।इस महीने की यह खासियत है कि इसके शुरू होते ही लोग अपने काम को कम कर देते हैं और इबादत को बढ़ा देते हैं इतना ही नहीं इस महीने में अगर कोई किसी व्यक्ति से मजदूरी करवाता है तो उसके कामों को कम कर दिया जाता है।यह महीना रहमत,मगफिरत और जहन्नम से आज़ादी पाने का महीना है।इस महीने में लोग सारे गलत काम को छोड़ कर रोज़ा रखते हैं,पवित्र कुरआन और नमाज़ पढ़ते हैं और अल्लाह से दुआएं मांगते हैं।

क्या है रोज़ा:-भछियार मदरसा अशरफुल उलूम के मौलाना मो.अय्यूब अंसारी ने बताया कि अरबी भाषा में रोजे को सोम कहते है।सोम का बहुवचन सेयाम है।इसलिए माहे रमजान को माहे सेयाम भी कहा जाता है।सोम का शाब्दिक अर्थ होता है रूकना।इसके मतलब रोजा इबादतों में वह अल्लाह को राजी करने का इबादत है जिससे आदमी सारी बुराइयों से दूर हो जाता है।सारी बुराई से रुक जाता है।आगे उन्होंने बताया कि शरीअत के अनुसार माहे रमजानुल मुबारक में अहले सुबह यानी फजिर के अजान से पहले से लेकर शाम को सूर्यास्त तक किसी तरह का खाना-पीना और सभी प्रकार के इच्छाओं को रोकने का नाम रोजा है।

रोजा हर बालिग मर्द व औरत पर है फर्ज
वहीं मौलाना अय्यूब ने बताया कि रोजा हर मुसलमान वयस्क मर्द और औरत पर फर्ज है। बच्चे को भी रोजा रखने की आदत डालनी चाहिए, मुसाफिर,बीमार की हालत में गर्भवती महिला और दूध पिलाने वाली औरत को रोजा रखना ज़रूरी नहीं है।वह बाद में रोजा रख सकती है।रोज़ा सिर्फ भूखे रहने उपावास करने का नाम नहीं है बल्कि रोज़ा पूरे शरीर के हर अंग पर फ़र्ज़ है।आंख,कान,मुंह,नाक,दिल,दिमाग,सोंच इत्यादि पर फर्ज है।रोजेदार रोजा की हाल में झूठ नहीं बोलना,गलत नहीं देखना,किसी का बुरा नहीं सोचना,यहां तक कि अपनी सारी इच्छाओं को मारना ही रोजा है।

सन दो हिजरी में फर्ज हुआ था रोज़ा
रमजानुल मुबारक का रोजा सन दो हिजरी में फर्ज किया हुआ था।रोजा अहले किताब (आसमानी किताब) के मानने वालों पर फर्ज किया गया है। हजरत मुसा अलैह सलाम के काल में आशूरा यानी दस मुहर्रम को रोजा फर्ज था।लेकिन हजरत मोहम्मद (स़व़) के काल में रमजानुल मुबारक के तीस रोजे फर्ज किये गये जो रहती दुनिया तक कायम रहेगा।

रमजान के रोज की फ़ज़ीलत
रमजानुल मुबारक के महीने में पवित्र कुरान नाजिल किया गया।यह महीना अल्लाह के निकट होने का महीना है। अल्लाह इसी महीने में रहमतों की बारिश करता है।रमजान के रोजे के बारे में कुरान में आया कि ऐ इमान वालों तुम पर रोजा फर्ज किया गया था ताकि तुम पहरेजगार और तकवा वाला बनो।सारी बुराइयों को छोड़कर अच्छाई की तरफ रुख इख्तियार करो।वहीं रोजा की शुरुआत अहले सुबह सेहरी खाने के बाद से ही होती है।सेहरी खाने में बरकत है। अगर सेहरी खाते समय अजान हो जाये तो खाना तुरंत छोड़ दें।

इफ्तार का है महत्व
खाना,पानी और अपनी सारी इच्छाओं को मारकर रोजेदार सूर्यास्त होने के बाद ही इफ्तार करते हैं।इफ्तार में जल्दी करना और खजूर से इफ्तार करना सुन्नत है।खजूर न मिले तो पानी पी लें।हदीस में आया है कि इफ्तार के समय रोजेदारों की दुआ कबूल होती है। रोजेदारों के मुंह की बदबू अल्लाह को पसंद है।इफ्तार करना और कराना पुण्य का काम है।

रमज़ान के महीने में तरावीह
इफ्तार करने के बाद रोजेदार नमाज-ए-एशा के बाद यानी देर शाम हरेक मस्जिद या दूसरी सार्वजनिक स्थानों में तरावीह की नमाज पढ़ी जाती है।इस नमाज में काफी भीड़ रहती है।पूरे तीस दिन तक हाफिज एक कुरान को मुकम्मल पढ़ता है और पीछे लोग कुरान को सुनते है।

शबे कदर की 05 रात में की जाती है जोर-शोर से इबादत
रमजानुल मुबारक के महीने को अशरा यानी तीन दहाई में बांटा गया है।पहल अशरा यानी एक से दस रमजान तक रहमतों का है।इसमें रहमतों की बारिश होती है।दूसरा अशरा यानी 11 से 20 रमजान तक मगफिरत का है।वहीं तीसरा अशरा 21 से 30 रमजान तक जहन्नुम से निजात पाने का हैं।अंतिम अशरा में ही 21, 23, 25, 27, 29 तक के 05 रातों में से किसी एक रात में पवित्र कुरआन नाज़िल हुआ यानी उतारा गया।कुरान में आया है कि हजारों महीनों के इबादत से बढ़कर है रमज़ान के महीने के सबे कदर की रात।इस रात में इबादत का सबाब एक हजार महीनों तक इबादत करने का मिलता है।

जकात देना है फर्ज
रमजान के महीने में हर दौलतमंद लोगों को जकात देना फर्ज है।जकात उन लोगों पर फ़र्ज़ है जो 7.5 तोला सोना और 52.5 तोला चांदी रखता हो या दोनों के बराबर रूपये हो। रमजान में जकात देने का सबाब 70 गुना अधिक मिलता है।जकात गरीब,बेबस और लाचार लोगों को दिया जाता है।

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