बांटा जा सकता है RBI का काम


वित्त मंत्री अरुण जेटली ने फरवरी, 2015 में अपने बजट भाषण में वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी के गठन का प्रस्ताव रखा था। नीति आयोग की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में कुमार ने कहा है कि इस खास कार्यालय को अलग करना जरूरी है, क्योंकि इसके बाद आप सार्वजनिक ऋण प्रबंधन पर अधिक ध्यान दे पाएंगे। इससे सरकार को अपने ऋण की लागत में कमी लाने में मदद मिलेगी।
वर्तमान में बाजार से ऋण लेने सहित अन्य सरकारी कर्ज का प्रबंधन रिजर्व बैंक करता है। सरकार को इस बाबत फैसला करना है कि किस प्रकार आरबीआई की जिम्मेदारियों को बांटा जाए। उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय करने का वैधानिक अधिकार रिजर्व बैंक को देना सरकार का साहसिक फैसला है। पीडीएमए के गठन का विचार हितों के टकराव को दूर करने के चलते सामने आया है। क्योंकि आरबीआई प्रमुख ब्याज दर पर फैसला करता है। इसके अलावा वह सरकारी बॉन्डों की खरीद और बिक्री भी करता है। बैंकिंग क्षेत्र की ओर इशारा करते हुए कुमार ने कहा कि भारत को वैश्विक आकार के बैंक चाहिए। उन्होंने कहा, भारत का सबसे बड़ा बैंक दुनिया में 60वें स्थान पर है और वैश्विक वित्तीय बाजारों में आपकी स्थिति को मजबूत नहीं करता है।

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