समस्तीपुर-रोसड़ा बाईपास पथ के किनारे खुले में फेंके जा रहे कचरे, विभिन्न बिमारियों से ग्रसित हो रहे है मुहल्ले वासी

रमेश शंकर झा, समस्तीपुर बिहार
समस्तीपुर:- जिले के समस्तीपुर-रोसड़ा बाईपास पर पुरानी दुर्गा स्थान मंदिर के पीछे बांध किनारे खुले में ही कचड़ा फेंका जा रहा है। कचड़े की वजह से आसपास के लोग विभिन्न बिमारीयों से ग्रसित हो रहे है। आपको बता दें कि इस इलाके के आस-पास घनी आबादी है। नगर परिषद का कचरा प्रबंधन कूड़े से भी बदतर है। कचरा प्रबंधन कूड़े से भी ज्यादा बिखरा हुआ है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की चेतावनी के बावजूद नगर परिषद, अस्पताल व उद्योगों ने नियमों का पालन नहीं किया और न ही बोर्ड ने उनके खिलाफ कोई खास कार्रवाई ही की। इनसे निकले कचरा अंतत : टेचिंग ग्राउंड में ही जाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। स्वच्छता अभियान चलाकर शहर में कचरों का उठाव किया जा रहा है। इसके बाद भी शहर स्वच्छ नजर नहीं आ रहा है। खास बात यह है कि शहर का कचरा शहर में फेंका जा रहा है। कार्बनिक और अकार्बनिक कचरों को एक साथ टेंचिंग ग्राउंड में फेंका जा रहा है। इन कचरों को डिस्पोजल करने के लिए नप के पास कोई ठीक ठाक सिस्टम नहीं है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत प्रदूषण फैलाना दंडनीय अपराध है। यदि इस कानून का सही ढंग से पालन किया जाय तो शहर की तसवीर बदल सकती है।

अस्पतालों का कचरा :
अस्पतालों के कचरा प्रबंधन के लिए बनी कामन बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फेसल्टी संस्था का सभी अस्पतालों को सदस्य होना होता है़ संस्था अस्पतालों का कचरा उठाती है और उनका निस्तारण करती है। इस संस्था का सदस्य बनने के बाद बोर्ड किसी अस्पताल को प्राधिकार प्रदान करता है।

छोटे-मोटे उद्योग बने मुसीबत :
किसी भी उद्योग को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में प्राधिकार के लिए आवेदन करना होता है। इसके बाद बोर्ड के सदस्य संबंधित उद्योग की हवा व पानी के प्रदूषण की जांच करते हैं। मानक के अनुरूप मिलने पर लाइसेंस दिया जाता है।

नगर परिषद भी करता मनमौजी :
नगर परिषद द्वारा कचरा का उचित निस्तारण नहीं किया जाता है। म्यूनिसिपल सालिड वेस्ट रूल्स के तहत नगर पालिकाओं को राज्य प्रदूषण बोर्ड से प्राधिकार प्राप्त करना होता है। इसके लिए आवेदन करना होता है जिसमें पूरी सूचना देते हैं कि प्रतिदिन कितना कचरा पैदा होता है। उसका शुद्घीकरण व निस्तारण कैसे करते है़ संतुष्ट होने पर उन्हें प्राधिकार दिया जाता है।

सजा का है प्रावधान
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत प्रदूषण फैलान दंडनीय अपराध है। जल, भूमि, वायु प्रदूषण फैलाने वाले गतिविधियों में लिप्त लोगों को इस अधिनियम के तहत 5 साल की एवं 1 लाख के जुर्माना से दंडित किया जा सकता है। इसके बाद भी वह प्रदूषण फैलाने से बाज नहीं आता है तो फिर से 7 साल की सजा दी सकती है़ इस प्रकार के मामलों में कोई व्यक्ति परिवाद दायर कर सकता है।

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